भारतीय समाज में जातियों का संक्रमण: आत्मसातीकरण के विशेष सन्दर्भ में

डॉ॰देवेन्द्र कुमार सिंह

Abstract


भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था इतिहास की एक विशिष्टतम और विलक्षण सामाजिक संस्था है। यह भारतीय समाज की अत्यन्त पुरानी सामाजिक इकाई है, जिसने अनेक प्रकार के असमानताओं को जन्द दिया है। समकालीन समय में भी समतावादी समाज के निर्माण में यह व्यवस्था आज भी एक बाधा बनी हुई है। जाति-व्यवस्था ने अदृश्य सिद्धान्त के तहत एक ऐसा सोपानात्मक ढांचा तैयार किया जो वर्ण-प्रतिमान में समाहित करके आसानी से समझा जा सकता है। वस्तुतः चार वर्णों से ही जाति का सम्बंध रहा है। यह अलग बात है कि अस्पृश्य अनिरवसित हरद्र के रूप में अपनी वर्णेत्तर पहचार के रूप में जाने जाते रहे हैं। भारतीय समाज में व्यापार, कर्म और धर्म जैसे हिन्दु धर्मशास्त्रीय प्रत्यय जाति प्रथा से जुड़े हुए हैं और उसी के तहत व्याख्यायित होते रहे हैं। इतना ही नहीं भारतीय परिप्रेक्ष्य में जाति ने राजनीतिक सत्ता और स्तर के विभेदीकरण की व्यवस्था की स्थापना भी की। यह अलग बात है कि ‘शक्ति और आर्थिक नियंत्रण ने सदियों से ‘आत्मसातीकरण’ के तहत जाति के जकड़न को शिथिल करने का प्रयास निरन्तर गतिमान है।


Keywords


सामाजिक संरचना, चतुरवण्र्य, पुरूष सूक्त, जजमानी-व्यवस्था, विश्, वैदिक समाज, हड़प्पा समाज, अष्टाध्यायी, ब्रह्म-क्षत्र

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