खरगोन जिले के अनुसूचित जनजाति वर्ग के कृषकों द्वार लिये जाने वाले ऋण के उपयोग का अध्ययन करना।

डॉ स्मिता शहा

Abstract


प्रत्येक व्यवसाय को सुचारू रूप से चलाने के लिए पूंजी की आवष्यकता होती है। कृषि भी एक व्यवसाय है, जिसमें पूंजी की आवष्यकता अन्य उद्योगों की अपेक्षा अधिक होती है। यहाँ पर साधारणतः खेती का सम्पूर्ण संगठन एक व्यक्ति पर निर्भर होता है। यहां पर खेत छोटे-छोटे एवं बिखरे हुए है। अतः उत्पादन बहुत कम होता है। कृषि उत्पादन में फसल बोने से लेकर काटने तक की अवधि काफी लम्बी एवं निष्चित होती है। किसान अपना उत्पादन बेचे बिना पूँजी नहीं जुटा सकता। भारत में खेती अतिवृष्टि, अनावृष्टि तथा किट आक्रमण आदि का षिकार होती है। इसके अतिरिक्त कृषि मूल्यों में उच्चावचन होने से किसानों को हानि उठानी पड़ती है। कृषि व्यवसाय में बचत की राषि कम होने के कारण कृषकों के पास उपलब्ध पूंजी आवष्यकता से बहुत कम होती है, जिसे वे दूसरों से ऋण लेकर पूरा करते हैं। किसान जब तक अपनी फसल काटकर विक्रय नहीं कर देता तब तक उसकी लगाई हुई पूँजी उसे वापस नहीं मिल सकती, अतः किसान के अपने घर के लिए, मजदूर की मजदूरी के लिए, खाद, बीज क्रय करने के लिए, पैदावर की बिक्री के लिए तथा बाजार में पहुंचाने के लिए पूँजी की आवष्यकता होती है।

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References


जनगणना 2011

अधिक भू-अभिलेख, खरगोन

भारत 2008 प्रकाषन विभाग सूचना व प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार

स्त्रोत. & agriculture statistics at a glance directorate of economics and statistics, ministry of agriculture, government of India new Delhi.


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