शरीर की प्यास और ज्ञान की भूख : अंतर्द्वंद

धनन्जय सिंह यादव

Abstract


भूख और प्यास’ दो ऐसे शब्द हैं जो एक विशेष प्रकार की शारीरिक आवश्यकताओं का एहसास कराते हैं | लेकिन इन सब के इतर इनके कई रूप होतें हैं, परन्तु अपने हर रूप में ये तीव्रता की अवस्था में होतें है | भूख एवं प्यास का परिभाषीकरण अलग-अलग दृष्टिकोणों से होता आया है | समाजविज्ञानी, भाषाविज्ञानी, मनोवैज्ञानिक एवं तरह-तरह के विज्ञानियों एवं वैज्ञानिकों ने इनकों बताया है | इस भाग में भूख एवं प्यास को शारीरिक एवं मानसिक आधार पर संदर्भित किया गया है, जिसमें मुख्य रूप से विद्यालयी गतिविधियों में सम्मलित समस्याओं को दर्शाया गया है | यह अनुभव शोधार्थी का अपना व्यक्तिगत अनुभव है जिसे मैदानी कार्य के दौरान अवलोकन के आधार पर किया गया है | वस्तुतः क्षेत्र अध्ययन कार्य विद्यालयों से सम्बंधित रहा है इसलिए इस समस्या के आलोक में भी विद्यालय ही हैं | विद्यालयों की अंतःक्रिया में अनेक घटक आपस में जुड़े होते हैं तथा ये सभी मिलकर संयुक्त रूप से कार्य करते है, इन घटकों में जो घटक मुख्य रूप से जुड़े होतें है उनमें से (समाज, सरकार, विद्यालय, बच्चें, अध्यापक, अभिभावक, शासन नीति एवं परिवेश) कुछ महत्वपूर्ण तत्व हैं | ये सारे तत्व आपस में इस तरह से संरचित होतें हैं कि किसी न किसी रूप में एक दुसरे को सकारात्मक या नकारात्मक रूप से प्रभावित अवश्य करतें हैं | इन सब कारकों में सबसे महत्वपूर्ण कारक है शासन नीति जिसका निर्धारण होता है राजसत्ता द्वारा | राजसत्ता इन सभी कारकों में सबसे अधिक सशक्त एवं प्रभावशाली होती है तथा वह किसी भी प्रकार की व्यवस्थाओं का निर्धारण जनभावनाओं के अनुरूप करती है | जनतंत्र की ख़ूबसूरती भी इसी बात में है कि वह लोक-कल्याण एवं मानवीय हितों को सर्वोपरी मानते हुए उनके विकास का सदैव प्रयास करता है | राजसत्ता द्वारा सामाजिक व्यवस्थायें बनाये रखने हेतु अनेक संस्थागत प्रयास किये जाते हैं, उन्हीं में से एक व्यवस्था है ‘शिक्षा’ | हालाँकि शिक्षा के अनेक रूप बताये गयें है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों मे जो सबसे अधिक प्रचलित एवं प्रभावी भूमिका में है, वह है शिक्षा की औपचारिक प्रक्रिया और शिक्षा की औपचारिक प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है ‘विद्यालय’ | विद्यालय को सामाजिक प्रक्रियाओं का निर्माण स्थल माना जाता है क्योंकि सामाजिक प्रक्रियायें एवं विद्यालयी प्रक्रियाएं बहुत सारे मामलों में समरूपता लिए हुए होंती हैं , इस तरह विद्यालय महत्वपूर्ण कारक बन जाता है समाजीकरण की प्रक्रिया का | विद्यालय न सिर्फ समाजीकरण की प्रक्रियाओं को मजबूती प्रदान करते हैं बल्कि शिक्षा से जुड़े तमाम मुद्दों को भी रेखांकित करते हैं जो शिक्षा प्रक्रिया का निर्धारण करते हैं | इन तमाम मुद्दों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा शिक्षा की गुणवत्ता का भी है ; शिक्षा की गुणवत्ता को कम करनें या बढ़ानें में कई कारक होते हैं | गुणवत्ता का एक पहलू उपलब्ध बुनियादी सुविधाएँ भी होती है क्योंकि जब गुणवत्ता का निर्धारण किया जाता है तो सुविधाएँ भी समान महत्व रखती हैं |

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