वर्तमान भारत में संवैधानिक रूप से नारी की स्थिति में सुधार

डॉ. चिन्तामणि राठौर

Abstract


प्राचीनकाल से हमारी संस्कृति में महिलाओं को बहुत मान-सम्मान प्राप्त था। मुस्लिम आक्रान्तओं के पश्चात् से लगाकर अंग्रेजों की गुलामी वाले काल में महिलाओं की स्थिति निम्न या सामान्य श्रेणी की हो गई थी और अनेक राजनैतिक-सामाजिक बुराइयों के मध्य स्पष्ट तौर पर भेदभाव होने लगा और पूरे देश में दिखने भी लगा था, इसी काल कुछ समाज सुधारक आगे आये, परिणाम आप पूरे देश में वर्तमान देख रहे है ? भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् कुछ राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एक आर्थिक परिवर्तन हुए उससे कई अधिनियम एक कानून बने, इन अधिनियम व कानूनों के कारण महिलाओं की दशा में सुधार आया, परन्तु आज भी संवैधानिक रूप से भारत में नारी की स्थिति जितनी सुधरी उतनी व्यावहारिक नारी में दृष्टिगत नहीं हो सकी है, बस इतना हुआ है कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पस्थिति में हुए परिवर्तन के फलस्वरूप नारी पिंजरे का द्वार खोलकर खुले आसमान में अब छोटी-छोटी उड़ानें भरकर आत्मनिर्भर एवं संतुष्ट होने लगी है जैसे मध्यप्रदेश की राजपाल आनन्दीबेन, भारत की रक्षा मन्त्री निर्मला और वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष श्रीमति सुमित्रा महाजन और अन्य महिलाएँ शिखर पर है। फिर भी विदेशी नारियों की तुलना में अब भी भारतीय नारी बहुत पीछे है, फ्रांस और अमेरिका में जितनी स्वतन्त्रता और आत्मनिर्भरता प्राप्त है, इग्लैण्ड आदि देशों में जितने अवसर सुलभ है, उतने भारत में भारतीय नारी को अभी तक नहीं है। भारत के संविधान और उच्च न्यायालय सुप्रिम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) के सहयोग से आधुनिक विचारों से ओतप्रोत स्वातन्त्र्योत्तर पीढ़ी में नवजागृति के प्रस्फुटन से नारी जीवन में बदलाव व चेतना का संचार जरूर हुआ है। हम सब जानते है नारी जीवन की अनेक असंगतियाँ है जैसे - बालविवाह, अनमेल विवाही, पुनर्विवाह, बहुविवाह, विधवा विवाह अन्तर्जातीय विवाह, वैश्या विवाह, अशिक्षा, दहेज प्रथा, पर्दाप्रथा, तलाक, असफल दाम्पत्य जीवन एवं अर्ध सम्बन्धी समस्याओं से ग्रस्त नारी जीवन, ये सब यर्थाथ के धरातल पर भारत में विद्यमान है।


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